कृत कर्मो की साक्षी मां कात्यायनी: श्री भगवान वेदांताचार्य

कृत कर्मो की साक्षी मां कात्यायनी: श्री भगवान वेदांताचार्य
षड्दर्शन के बोध एवं यज्ञ के अनंग में समाहित शक्ति ही कात्यायनी : श्री भगवान वेदांताचार्य
दमोह- त्रिकाल में किये कर्मों की साक्षी होने से साधक के सत, चित, आनंद रूप की अधिष्ठात्री मां कात्यायनी हुई , भाव में प्रफुल्लित करने की शक्ति जिसे आपने ओर खींचे और मन सहज जिसके आंचल की छांव में आनंद की चाह पूर्ण करने को उद्धत हो वही कात्यायनी देवी दुर्गा के छठवें अंश में प्रगट हुई । जीवन में जब कर्म विपाक सामने आ के जीव को भटका देता है ऐसे में अपने कार्यों को कर्म न समझ कर सद्कर्मों के लिए प्रेरित हो एक ऋषि ने तपस्या प्रारंभ की जिससे कात्य ऋषि के घर उत्पन्न हुई देवी या “कात्यायन गोत्र” में जन्मी “शक्तिरूपा” ही कात्यायनी कहलाई । कात्यायन की गोद में एक पुत्री का जन्म मानो ऐसे जिसने संपूर्ण विश्व को नियंत्रित किया अपनी मुदिता से
इसलिए पतंजलि को कहना पड़ा ।
मैत्रिकुरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदु:खपुण्यपुण्यविषयानं भावनातश्चित्प्रसादनम्*
मैत्री करुणा मुदिता और उपेक्षा जिसमें उपासक
सुख की वस्तु के प्रति मित्रता, दर्द के प्रति करुणा, सद्गुण के प्रति आनंद, और बुराई के प्रति
उपस्थिति ही मानव की सफलता का कारण बनता है। चित्त का स्पष्टीकरण अभ्यास में समाहित है। ऐसा कहते हुए महंत श्रीभगवान आगे कहते है जिसमें शास्त्रीय विधान के साथ दैवीय कृपा समाहित हो ,
कात्यायनी का स्वरूप केवल युद्ध और शक्ति का नहीं, बल्कि न्याय, धर्म और सत्प्रेरणा का भी प्रतीक है जब महिषासुर से युद्ध विराम के पश्चात् ज्ञान की अविरल धारा में मानो षड्दर्शन प्रवाह ही आ गया हो, मार्कण्डेयपुराण के अनुसार जिसकी कृपा से सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त रूपी ज्ञान प्रगट हो कर अपने प्रणेता आचार्य के रूप में गौतम, कणाद, जैमिनि,कपिल, पतंजलि, बादरायण ने अक्षर विज्ञान की आधार शिला को समाज में स्थापित किया बही वास्तव में कृत हुआ । जो करने योग्य हो उसे कृत के रूप में परिभाषित करते हुए श्रीभगवान वेदांताचार्य रसिक जी पुनः कहते है कि नवरात्रि के छठवें दिन उत्पन्न इस माता ने वैदिक वांग्मय में षड्दर्शन प्रवाह की दार्शनिक विवेचना के लिए अपने पिता कात्य का वचन स्वीकार किया, और उन्हीं के समान तेजस्वी छः ऋषियों की एक दिव्य शक्ति युगीय व्यवस्था के अंतर्गत सौंप दी, जिससे युद्ध पर्यन्त यज्ञ के अनंग में ज्ञान पलता रहे। जिसका पोषण ब्रह्म विद्या में सहायक हो और हम नव दिन में 64 कलाओं जिसमें 64 ही योगिनी शक्तियां भी प्रसन्न हो जाती एवं साधक को आशीष दे उसे विद्या में प्रवीण बना देती है । नव समाज के निर्माण करने में परम्परा का निर्वहन सुगम प्रतीत होता और वैदिकता भी शिरोधार्य रहती जब हम केवल समर्थ के छांव में विराम को प्राप्त न होकर सिद्धांतिक मापदंडों को पूरा करने में सक्षम हो जाएं और निज आचरण को अपना हथियार बना ले तब यह नवरात्रि पर्व मनाना सार्थक हो जाए ।।




